“बाल सुरक्षा की ओर एक कदम: चंडीगढ़ का प्रयास”
“बाल सुरक्षा की ओर एक कदम: चंडीगढ़ का प्रयास”
1. परिचय
चंडीगढ़ प्रशासन ने अपने बाल संरक्षण कार्यक्रम को अत्यंत गंभीरता से लिया है क्योंकि यह शहर बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और उनकी समग्र भलाई के लिए अग्रणी मॉडल प्रस्तुत करता है । बाल शोषण और दुर्व्यवहार को रोकने का लक्ष्य सिर्फ सरकारी नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज को इसके प्रति संवेदनशील बनाने की जिम्मेदारी भी लेता है।
2. पृष्ठभूमि और आवश्यकता
राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय आंकड़े बताते हैं कि भारत में 50% से भी अधिक बच्चे किसी ना किसी रूप में शारीरिक या मानसिक पीड़ा का सामना कर रहे हैं ।
आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि 70% से अधिक पीड़ित बच्चे चुप रह जाते हैं—घर या करीबी लोगों द्वारा किए गए अत्याचार की रिपोर्ट ही नहीं करते ।
चंडीगढ़ जैसे विकसित शहर में भी बाल त्रासदियों की घटनाएं होती हैं, किंतु जागरूकता, प्रशिक्षण, निगरानी और कानून-शक्ति के समन्वित प्रयोग से इसे न्यूनतम पर लाया जा सकता है।
3. मुख्य तत्व– नीति और संरचना
3.1 प्रशासनिक ढाँचा
चंडीगढ़ में चंडीगढ़ बाल अधिकार संरक्षण आयोग (CCPCR) 2014 में स्थापित हुआ था, जिसका उद्देश्य बाल अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा समेत सभी क्षेत्रों में बच्चों की भलाई सुनिश्चित करना है
इसका संचालन जिला उपायुक्तों तथा जिला बाल संरक्षण अधिकारियों के सहयोग से होता है, जो स्कूलों, आश्रयों, एनजीओ, पुलिस आदि के साथ मिलकर योजना लागू करते हैं ।
3.2 कानूनी आधार
POCSO एक्ट (2012), JJA अधिनियम (2012) और किशोर न्याय अधिनियम (2015) जैसे कानूनों के तहत अपराधों को रोकना और रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना इनके मुख्य स्तंभ हैं
विशेष कर स्कूलों में “बाल शोषण निगरानी समिति (CAMC)” का गठन अनिवार्य किया गया है, ताकि गुरेज की स्थिति में तत्काल जांच हो सके
4. प्रमुख पहलकदमी और कार्यक्रम
4.1 स्कूलों में जागरूकता अभियान
स्कूलों में कार्यशालाओं का आयोजन, जिसमें पॉक्सो एक्ट की जानकारी दी जाती है। दिसंबर 2024 को लगभग 112 सरकारी स्कूलों के प्राचार्यों को प्रशिक्षित
।इसी अभियान के तहत प्राचारकों और शिक्षकों से अपेक्षा होती है कि वे विद्यालय स्तर पर निगरानी बढ़ाएँ और रिपोर्टिंग सिस्टम को त्वरित बनाएं।
4.2 साइबर सुरक्षा और लड़कियों के संरक्षण हेतु कार्यकम
जनवरी 2025 में मनीमाजरा स्थित वेदिक गर्ल्स स्कूल में ‘लड़कियों के अधिकार एवं साइबर सुरक्षा’ पर विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें पुलिस तथा स्कूल शिक्षा विभाग ने मिलकर छात्राओं को उचित मार्गदर्शन
यह पहल डिजिटल एजुकेशन के बढ़ते युग में ऑनलाइन जोखिमों की जानकारी देकर उन्हें सुरक्षित वातावरण प्रदान करती है।
4.3 बाल भिक्षुकों व प्रवासी बच्चों की पहचान
चंडीगढ़ प्रशासन ने बाल भिखारियों के मामलों की पहचान कर उन्हें शून्य पर लाने का लक्ष्य रखा है। इसकी जिम्मेदारी डिप्टी कमिश्नर के नेतृत्व में एक कोर टीम
इसमें ट्रैकिंग सिस्टम, अभिसरण मॉडल जैसी टेक्नो‑समर्थित प्रणालियाँ प्रयोग की जा रही हैं; साथ ही माता‑पिता की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना से जोड़कर स्थायी समाधान पर बल दिया गया
4.4 ग्रामीण व वंचित वर्गों के बच्चों के लिए वर्चुअल कक्षा
पंचकूला, करनाल, गुरुग्राम सहित आसपास के क्षेत्रों में हरियाणा राज्य बाल कल्याण परिषद् परियोजनाओं के माध्यम से “Real Time Interactive Virtual Classrooms” की स्थापना की गई; इस दिशा में चंडीगढ़ के विद्यालयों को भी जोड़ा गया ताकि शिक्षा का दायरा और प्रभाव बढ़ाया जा
4.5 बाल संरक्षण केंद्र और आश्रय
सीमावर्ती क्षेत्रों में बनाए गए बाल उपवन आश्रमों में नियमित निरीक्षण, स्वास्थ्य चेक‑अप, काउंसलिंग एवं कौशल विकास जैसी सुविधाएँ सुनिश्चित की जा रही हैं, जैसा कि हाल ही में डीसी ने निरीक्षण कर कहा कि “इनकी शिक्षा व पोषण पर विशेष ध्यान हो।
5. संस्थागत सहयोग एवं सामुदायिक भागीदारी
अभियानों में स्थानीय पुलिस, स्कूल शिक्षा निदेशालय, कानूनी सेवा प्राधिकरण, एनजीओ एवं मीडिया सभी शामिल हैं; साथ ही जिलास्तरीय बाल संरक्षण समितियाँ नियमित बैठकों द्वारा निगरानी करती हैं
सामाजिक कार्यकर्ताओं व छात्र स्वयंसेवकों की भागीदारी से ऊर्जा मिलती है—जैसे Reddit पर एक स्वयंसेवक ने साझा किया कि वे “underserved kids को अंग्रेजी पढ़ाते हैं, 1:2 शिक्षक-छात्र अनुपात के साथ”
बाल संरक्षण आयोग समय-समय पर किताबों व जनसामग्री का विमोचन करता है, जो गुड टच-बैड टच, मानव तस्करी, शिक्षा जैसे अनेक विषयों पर प्रकाश डालती है
6. उपलब्धियाँ और असर
कानूनी जागरूकता वृद्धि: स्कूलों में CAMC समितियों की स्थापना ने प्रिंसिपलों में उत्तरदायित्व की भावना बढ़ाई है ।
बालिकाओं और साइबर सुरक्षा अधिकारों की समझ में वृद्धि हुई, छात्राओं के आत्मविश्वास व सुरक्षा की भावना में सुधार देखा गया ।
बाल भिक्षुकों की संख्या कम करते हुए प्रशासन ने सामाजिक सुरक्षा ढांचे को मजबूत किया—मूलतः माता‑पिता की आजीविका व तकनीकी मदद आधारित मॉडल के माध्यम से ।
आश्रय केंद्रों में बेहतर देखभाल सुनिश्चित करने हेतु काउंसलिंग, रुटीन स्वास्थ्य समीक्षा, पोषण सहित स्किल ट्रेनिंग की व्यवस्था मजबूत हुई
7. चुनौतियाँ और सुधार की दिशा
7.1 रिपोर्टिंग में संकोच
अधिकांश बच्चों द्वारा अपराध की रिपोर्ट न करना एक बड़ी समस्या है; कारण भय, सामाजिक दबाव या अविश्वास का होना हो सकता है ।
7.2 डेटा संग्रह और विश्लेषण
बाल श्रम व बाल भुखमरी के वास्तविक आंकड़ों की कमी है, जिससे रणनीति निर्धारण प्रभावित होता है ।
7.3 सामुदायिक विश्वास की कमी
कई परिवार या शिक्षक बाल शिकायतों को छोटे मामले मान अपने स्तर पर ही सुलझा लेते हैं, जिससे कानूनी प्रक्रिया तापान नहीं करता ।
7.4 शिक्षा व संसाधनों की असमानता
वर्चुअल क्लासरूम और प्रशिक्षण की सुविधा देने के बावजूद दूरदराज इलाकों की छात्राओं तक इसकी पहुंच सीमित है; बेहतर नेटवर्किंग और पोर्टेबल तकनीकों की आवश्यकता है ।
8. भविष्य की रूपरेखा
पूरी तरह तीस-पांच दिवसीय जागरूकता अभियान – विशेषकर माध्यमिक व उच्च विद्यालयों में।
मोबाइल ऐप/वाई-फाई आधारित आसान रिपोर्टिंग सिस्टम– बच्चे तुरंत शिकायत दर्ज कर सकें।
सभी सरकारी-प्रशासकीय संस्थानों में Cyber Safety Curriculum अनिवार्य करना।
रेगुलर फीडबैक व मॉनिटरिंग – आश्रय केंद्रों, स्कूलों और वर्चुअल कक्षाओं का त्रैमासिक निरीक्षण।
NGO/स्वयंसेवकों को प्रमुख समन्वयक के रूप में शामिल करना, जो grass-root स्तर पर जागरूकता व समर्थन दें।
9. निष्कर्ष
चंडीगढ़ का बाल संरक्षण कार्यक्रम दिल्ली‑एनसीआर की अपेक्षा छोटे पैमाने पर जरूर है, लेकिन यह नीति, कानूनी संरचना, सहभागिता, टेक्नोलॉजी व जन‑समुदाय को जोड़ने के दृष्टिकोण से देश में एक मॉडल बन सकता है। स्कूल स्तर पर जागरूकता, साइबर सुरक्षा, आश्रय सुविधा, कानूनी सख्ती, रिपोर्टिंग तंत्र एवं स्वयंसेवकों की भागीदारी ने इसे सुदृढ़ किया है। हालांकि रिपोर्टिंग दर और वास्तविक आंकड़ों की कमी जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हैं, फिर भी निरंतर सुधार और तकनीकी नवाचार इसे और प्रभावी बनाएंगे।
चंडीगढ़ का यह मॉडल बाल अधिकारों के संरक्षण और संरचना को सुदृढ़ करने की दिशा में एक प्रेरक उदाहरण है, जिसे अन्य नगर निकाय भी अवश्य अपनाएं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें